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	<title mode="escaped" type="text">نداي فطرت</title>
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	<updated>Wed, 20 Aug 2008 15:34:03 GMT</updated>
	<author><name>محسن غلامي</name></author>

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<updated>Sun, 13 Jan 2008 22:35:00 GMT</updated>
<title type="text">شبهات ناشي از جهل و بي سوادي</title>
<content type="text/html" xml:base="Http://Modir.ParsiBlog.com" xml:space="preserve">&lt;div dir=&apos;rtl&apos;&gt;&lt;P class=style76&gt;&lt;SPAN class=style82 lang=FA&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;FONT color=#800000&gt;با سلام&lt;?XML:NAMESPACE PREFIX = O /&gt;&lt;O:P&gt;&lt;/O:P&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=style81&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;SPAN class=style2 lang=FA dir=rtl&gt;عبارت ذيل که برايتان مي‌فرستم مرا به شبهه انداخته و متزلزل ساخته، مي‌ترسم ساختمان اعتقادم فرو ريزد،هرچند قلبم گواهي مي‌دهد که حتماً بايد توضيحي وجود&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=style2 dir=rtl&gt;&lt;SPAN lang=en-us&gt; &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=style2 lang=FA dir=rtl&gt;داشته باشد، خواهشمندم راهنمايي بفرماييد. &lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=style81&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;SPAN class=style2 lang=FA dir=rtl&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P align=center&gt;&lt;IMG alt=&quot;&quot; src=&quot;http://www.parsiblog.com/PhotoAlbum/nedayefetrat/wpzipg5w.gif&quot; width=500 align=center&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=style101 dir=rtl style=&quot;unicode-bidi: embed&quot;&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;SPAN class=style11&gt;&lt;SPAN class=style14 lang=FA&gt;با سلام و تشکر از شما دوست عزيز که قبل از اينکه هر گونه قضاوتي بکنيد و نتيجه‌اي بگيريد، سوال کرديد.&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;FONT color=#800000&gt;&lt;SPAN class=style102&gt;&lt;SPAN class=style14 lang=AR-SA&gt;اما جواب:&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;کسي که اين ترجمه را کرده پيداست که نه با زبان عربي آشنا بوده است و نه با کتب حديثي و روش نگارشي آنها، چرا که هم ترجمه را غلط فهميده و هم عبارت نويسنده و شارح را با متن حديث اشتباه گرفته و مخلوط کرده است، کاش شما دوست عزيز آدرس اين آقا و کتابش را نيز به ما ميداديد تا ارادتمان به ايشان کامل شود.&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;توضيح اينکه؛&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=style92&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT color=#800000&gt;اولاً؛&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;?XML:NAMESPACE PREFIX = U1 /&gt;&lt;U1:P&gt; &lt;/U1:P&gt;بعضي از قسمت‌هاي اين کلام، ناقص نقل شده، که بنده متن صحيح را مطابق با نسخه اصلي از بحارالانوار و مستدرک الوسايل که کاملتر است براي دوستان ميآورم:&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA&gt;بحارالأنوار 64 176 باب 9- أصناف الناس في الإيمان .....&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;FONT color=#4857aa&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;SPAN class=style107&gt;&lt;SPAN class=style114 lang=AR-SA&gt;13- مع، [معاني الأخبار] بالإسناد المتقدم عن الحسن بن يوسف عن عثمان بن جبلة عن ضريس بن عبد الملك قال سمعت أبا عبد الله ع يقول نحن قريش و شيعتنا العرب و عدونا العجم، &lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;FONT color=#4857aa&gt;&lt;SPAN class=style107&gt;&lt;SPAN class=style114 lang=AR-SA&gt;بيان و شيعتنا العرب أي العرب الممدوح من كان شيعتنا و إن كان عجما و العجم المذموم من كان عدونا و إن كان عربا &lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA&gt;مستدرك‏الوسائل 15 483 52- باب نوادر ما يتعلق بأبواب كتاب &lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;FONT color=#4857aa&gt;&lt;SPAN class=style57&gt;&lt;SPAN class=style14 lang=AR-SA&gt;لَمَّا وَرَدَ سَبْيُ الْفُرْسِ أَرَادَ عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ بَيْعَ النِّسَاءِ وَ أَنْ يَجْعَلَ الرِّجَالَ عَبِيدَ الْعَرَبِ فَقَالَ لَهُ أَمِيرُ الْمُؤْمِنِينَ ع إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ ص قَالَ أَكْرِمُوا كَرِيمَ كُلِّ قَوْمٍ قَالَ عُمَرُ قَدْ سَمِعْتُهُ يَقُولُ إِذَا أَتَاكُمْ كَرِيمُ قَوْمٍ فَأَكْرِمُوهُ فَإِنْ خَالَفَكُمْ فَخَالِفُوهُ فَقَالَ لَهُ أَمِيرُ الْمُؤْمِنِينَ ع هَؤُلَاءِ قَوْمٌ قَدْ أَلْقَوْا إِلَيْكُمُ السَّلَمَ وَ رَغِبُوا فِي الْإِسْلَامِ&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;SPAN class=style92&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT color=#800000&gt;ثانياً؛&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt; اين عبارت از دو بخش تشکيل شده است، يک بخش، متن حديث است و بخش ديگر کلام شارح است و امّاً متن حديث، تنها اين قسمت است که ميفرمايد: &lt;B&gt;«نحن قريش و شيعتنا العرب و عدونا العجم»،&lt;/B&gt; و تا قبل از کلمه &lt;B&gt;«بيان»&lt;/B&gt; که شارح روي آن خط کشيده تمام ميشود و از آن جا به بعد همه عبارت اوست نه حديث.&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=style92&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT color=#800000&gt;ثالثاً؛&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt; اينکه شارح ميفرمايد: «&lt;B&gt;بيان اي العرب الممدوح من کان شيعتنا و ان کان عجماً و العجم المذموم من کان عدونا وان کان عرباً»،&lt;/B&gt; ترجمه‌اش اينست که:&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;بيان مطلب اينکه عربي که شيعه ما باشد ممدوح و شايسته است(پس معيار شايستگي، شيعه بودن است) اگر چه عجم و غير عرب باشد و اما عجم (غير عربي) که دشمن ما اهل بيت باشد مذموم و ناشايسته است (پس معيار مذموم بودن، دشمني با اهل بيت است) اگر چه عرب باشد.&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=style101 dir=rtl style=&quot;unicode-bidi: embed&quot;&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;ضمناً مقصود حديث با اين توضيح روشنتر مي‌شود که؛&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;عربها روي تعصّبي که به قوم و نژاد خويش داشتند فقط عرب و نژاد خود را خودي مي‌دانستند و عجم(غير عرب) را غيرخودي و بيگانه مي‌شمردند و اين حديث در مقام زدودن و ردّ اين تعصّب آمده است، يعني همانطور که شارح حديث فرموده است مقصود حديث اينست که خودي و انسان ممدوح و پسنديده‌ کسي است که شيعه ما باشد ولو عجم و غير عرب باشد و بيگانه کسي است که دشمن اسلام و اهل بيت است اگر چه عرب باشد(پس در واقع عرب يا غير عرب بودن وجه امتيازي نيست).&lt;U1:P&gt;&lt;/U1:P&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA&gt;&lt;O:P&gt;&lt;/O:P&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=style104 dir=rtl style=&quot;unicode-bidi: embed&quot;&gt;&lt;SPAN class=style92&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT color=#800000&gt;رابعاً؛&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt; آنجا که نقل ميکند؛ &lt;B&gt;«لمّا ورد سبي الفرس&lt;/B&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA&gt; أَرَادَ عُمَرُ بْنُ الْخَطَّابِ بَيْعَ النِّسَاءِ وَ أَنْ يَجْعَلَ الرِّجَالَ عَبِيدَ الْعَرَبِ&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;.....»&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt; ترجمه‌اش اينست که: &lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;هنگامي که اسيران ايراني وارد مدينه شدند خليفه دوم خواست که زنهايشان را بفروشد و مردانشان را بردگان عرب قرار دهد.....&lt;U1:P&gt;&lt;/U1:P&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA&gt;&lt;O:P&gt;&lt;/O:P&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/P&gt;
&lt;P class=style104 dir=rtl style=&quot;unicode-bidi: embed&quot;&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;ضمناً اين هم جالب است که دنباله حديث را اين آقا نياورده است، چه اينکه در ادامه حديث آمده است که؛ &lt;/SPAN&gt;&lt;B&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA&gt;فَقَالَ لَهُ أَمِيرُ الْمُؤْمِنِينَ ع إِنَّ رَسُولَ اللَّهِ ص قَالَ أَكْرِمُوا كَرِيمَ كُلِّ قَوْمٍ.....&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/B&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;FONT color=#4857aa&gt;&lt;SPAN class=style107&gt;&lt;SPAN class=style14 lang=FA&gt;در اينجا اميرالمومنين ع (عليّ بن ابيطالب ع) اعتراض کرد که اينکار را نکن و اين حق را نداري چرا که رسول خدا ص فرموده است که بزرگان و گراميان هر قومي را گرامي بداريد.....&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA&gt;*******&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=style98&gt;&lt;SPAN lang=AR-SA&gt;حال با دقت به ترجمه و توضيحي که عرض شد، قضاوت کنيد که معنا چقدر متفاوت بوده است با آنچه اين آقا بيان کرده، ببينيد وقتي دين و متون ديني ما به دست افراد غير متخصص و نا آشنا مي‌افتد به چه سرنوشتي دچار ميشود!&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;SPAN class=style111&gt;&lt;SPAN class=style14 lang=AR-SA&gt;دوستان جوان هم بايستي دقت کنند و به هر سخني گوش دل فرا ندهند مگر آنکه اهليت داشته باشد.&lt;BR&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;FONT size=2&gt;&lt;STRONG&gt;&lt;SPAN class=style141&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;SPAN class=style115&gt;«فاسئلوا اهل الذکر ان کنتم لاتعلمون&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN class=style14&gt;&lt;SPAN class=style57&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;FONT color=#4857aa&gt;»&lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/STRONG&gt;&lt;SPAN class=style91&gt;&lt;SPAN class=style14&gt;&lt;U1:P&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;SPAN lang=FA&gt;&lt;SPAN class=style2&gt;&lt;FONT color=#4857aa&gt; &lt;/FONT&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/SPAN&gt;&lt;/FONT&gt;&lt;/P&gt;&lt;/U1:P&gt;&lt;/div&gt;</content>
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